Sunday, 15 January 2017

वाह, क्या करप्ट हैं हम !

    
                                                      वाह! क्या करप्ट हैं हम!


      मुझे खूब याद है जब मैं छोटा था तो छोटी सी भी गलती होने पर अपने ही मन में डर लगता था कि बेटा आज तो जोरदार डाट खानी पड़ेगी. एक बार भैंस के लिए घास लेने गया तो एक खेत में हरी-हरी घास जैसी चीज दिखाई दी, सोचा कि ये  तो बड़ी अच्छी हरी-हरी घास है, बस फिर क्या था, लग गए काटने. थोड़ी ही देर में गट्ठर बाँध कर घर ले आए. पहचान तो थी नहीं कि ये घास है या कोई फसल है. घर पहुचने पर दादी, बुआ, अम्मा, चाची सबने देखा तो खफा होने लगे. ये किसका नाश मार के  ले आया है? मेरी सारी ख़ुशी पल भर में काफूर हो गई. ये तो किसी की अच्छी-खासी हरी-भरी मसूर काट के ले आया है. थोड़ी देर में ही गुस्से में आग-बबूला होता खेत का मालिक चिल्लाता चला आ रहा था. मुझे कुछ नहीं सूझा तो घर के अन्दर घुस गया और चारपाई अपने ऊपर से गिरा ली. बाहर से कई लोगों की चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थीं. आखिरकार खेत मालिक को समझा बुझाकर शांत कर दिया गया और वह अपने घर वापस चला गया, लेकिन मेरा डर के मारे बुरा हाल था कि अब तो ज़रूर मार पड़ेगी. मैं  अब भी वहीं चारपाई के नीचे छिपा बैठा था. मुझे आस-पास न देखकर घरवाले चिंता करने लगे कि आखिर लड़का कहाँ चला गया. शुकर था कि पापा घर पर नहीं थे. चारों तरफ खोजने के बाद भी जब मेरा कोई पता नहीं चला तो घरवाले चिंता करने लगे. तभी मेरे भाई ने  चारपाई के नीचे झाँककर देखा और जोर से चिल्लाया, " ये रहे भैया!"
     मेरा डर के मारे बुरा हाल था कि अब ज़रूर मार पड़ेगी. डरते-डरते मैं बाहर निकला और नजरें नीची किये सबके सामने पहुँचा. जब मुझसे पूछा गया कि मैंने हिम्मत करके सबकुछ साफ-साफ बता दिया कि मुझे पता ही नहीं था कि वो कोई घास नहीं बल्कि फसल है. मैं तो उसे घास समझकर काट लाया था. यह सन्दर्भ मैं यहाँ इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ कि आप सभी ने वह समय देखा होगा जबकि भूल से भी अगर हमसे किसीका नुक्सान हो जाता था तो हम खुद अपने आपको दोषी समझते थे और ज़बरदस्ती अपने आपको सही साबित करने के वजाय अपनी गलती स्वीकार कर लेते थे. और ऐसा समय बीते बहुत ज्यादा समय नहीं बीता है. चलिए  ये तो बचपने की बात हो गयी. अब शीर्ष स्तर की बात करते हैं. हमारे देश के दूसरे प्रधान मंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री जी की बात करते हैं. हिंदुस्तान का शायद ही कोई नागरिक होगा जो इस महापुरुष का नाम न जानता हो. उनकी ईमानदारी, सत्यप्रियता, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है. उनके आस-पास भी पदलोलुपता या सत्ता की भूख जैसे शब्दों का उच्चारण करना भी पाप ही होगा. क्या ऐसे महापुरुषों का त्याग हमारे राजनेताओं के लिए कोई प्रेरणा प्रस्तुत नहीं कर सकता? क्या हमारा आज का समाज उनके जीवन से प्रेरणा लेकर ही आज की स्थिति का निर्माण कर रहा है. कहाँ है वह भारत जिसकी रचना के लिए इन महापुरुषों ने अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया? आज ज़रुरत है फिर से उन जीवन मूल्यों को न केवल समझने की , बल्कि दृढ़तापूर्वक उन्हें अपने जीवन में ढालने की.                                        
                                                                                                                                    प्रस्तुति
                                                                                                                               आचार्य प्रदीप 

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